kisan ki Azadi | किसान की आज़ादी ही देश का समृद्धि होगी

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kisan की आज़ादी ही देश का समृद्धि होगी

kisan की आज़ादी का क्या मतलब है, अक्सर यह सवाल हर किसी के जेहन में आता रहता है | देश की आज़ादी के 70 साल से उपर हो जाने के बावजूद आज भी किसान घौर शोषण, अन्याय व गरीबी का शिकार है |

kisan

 

पूरी दुनिया में कोई भी चीज बनती है तो उसकी कीमत उसे बनाने वाला तय करता है |सुई से लेकर जहाज तक चाहे किसी भी चीज को आप खरीदने चले जाओ, आपको विक्रेता द्वारा बताई गयी कीमत पर ही उसे खरीदना पड़ेगा |

सिर्फ किसान की फसल ही एक ऐसी चीज है जिसकी कीमत kisan नही बल्कि उसका खरीददार निर्धारित करता है |

साहूकार उसकी फसल को बोली लगाकर खरीदता है

जिस तरह हजारों साल पहले गुलामों को खरीदा बेचा जाता था |

बोली लगाकर किसान की मेहनत को खरीदे जाने की

इस प्रथा के खिलाफ को चौधरी छोटूराम के अलावा

आज तक किसी ने आवाज़ नहीं उठाई |

पहली बार जब मैंने अपनी छ: महीने की मेहनत को यूँ ही नीलाम होते देखा तो मुझे खुद में और किसी गुलाम में कोई फर्क नजर नहीं आया |

सालों से मंडियों में साहूकार के हाथों अपनी मेहनत को मनमर्जी के भाव पर नीलम होते देखना हमारी आदत बन चुकी है और इसे हमने अपनी किस्मत भी मान लिया है |

लेकिन यह हमारी किस्मत नही है, हमारी अपनी ही कमजोरी के कारण हमने इस गुलामी की जंजीर को अपने गले में पहन लिया है और हमारी किस्मत की चाबी साहूकार व सरकार के हाथ में दे दी है |

जिसका फायदा उठाकर हर छठे महीने यह हमारी मेहनत का खुला मजाक मंडियों में उड़ाते है | किसान की फसल का उतना भाव भी नहीं दिया जाता जितनी उसे पैदा करने में लागत आती है |

kisan के साथ कितना अन्याय किया जाता है

जब घाटे पर घाटा खाता वह उस फसल को उगाना बंद कर देता है तो फिर एक साल एकदम से उसका भाव दुगना तिगना बढ़ा दिया जाता है ताकि किसान फिर से उस फसल को बोना चालू कर दे |

एक बार धान को 4800 रूपये चढाकर

फिर कई साल 1500-2000 रू. क्विंटल के भाव पर लुटा जाता है

लेकिन ना तो सरकार को शर्म आती है ना ही साहूकार को और

न ही किसान उन साहूकारों से जवाब मांगता है कि

जब हर चीज की महंगाई उपर की और बढती है तो

सिर्फ उसकी फसल के भाव क्यों कम हो जाते है |

जब चावल की कीमत कभी नही घटती तो

उसके ही धन की कीमत क्यों कैसे घट जाती है?

सिर्फ धन ही नही ज्वर, बाजरा, कपास सब्जी हर फसल के साथ यही तमाशा होता है | kisan की आज़ादी से हमारा मतलब इस नीलामी की प्रथा पर कौड़ियों के भाव किसान की फसल खरीदे जाने का तमाशा बंद हो | उसकी फसल पर लगी लागत के हिसाब से हर फसल का लाभकारी समर्थन मूल्य निर्धारित करने की व्यवस्था को लागु किया जाये |

ताकि साहूकार व सरकार के खुनी  Panje से किसान आजाद हो सके |

जय हिन्द

जय किसान

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