Family Shaheed Bhagat Singh – शहीद भगतसिंह का बलिदानी परिवार

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दोस्तों हमारा आज का विषय है Family Shaheed Bhagat Singh – शहीद भगतसिंह का बलिदानी परिवार इस परिवार की जितनी सिफ्ता करे कम है | इनके विषय में हरियाणवी कवि ने कुछ इस तरह लिखा है :-
Family Shaheed Bhagat Singh
बाप और दादा, परदादा दुःख भरते भरते भरे गये
पर नाम न भुला, आज़ादी का, वे मरते मरते मरे गये
हाय आज़ादी, हाय आज़ादी, वो करते करते करे गये
करते रहे प्रचार देश में, वो फिरते फिरते फिरे गये
बाप मरा तो बेटा हो गया, किस्सा तमाम सुना हो र
लाहौर जिले में छोटा-सा एक बंगा गाम सुना हो र

उनके दादा सरदार अर्जुनसिंह संधू गोत्री जाट, गाव खटकड कला, जिला नवांशहर, पंजाब के बाशिंदे थे और इनका एक अच्छा खाता – पीता परिवार था |

आपकी पत्नी श्रीमती जयकौर की कोख से तीन बेटो ने जन्म लिया जो क्रमश: सरदार किशनसिंह, सरदार अजीतसिंह व स्वर्णसिंह थे |

पहली संतान सरदार किशनसिंह का जन्म सन 1878 में हुआ था औरे आपका विवाह विधावती से 1898 के आसपास हुआ |

आपकी नों संताने हुई उनमे से 6 बेटे और तीन बेटियां थी| Family Shaheed Bhagat Singh

आपकी इन 9 संतानों के नाम क्रमश: जगतसिंह, भगतसिंह, अमरकौर, कुलबीरसिंह, कुलतारसिंह, प्रकाशकौर, शकुंतला, राजेन्द्रसिंह और रणबीर सिंह थे |

Family Shaheed Bhagat Singh

भगतसिंह का जन्म 28 सितम्बर सन 1907, दिन शनिवार को गाव बंगा , जिला लायलपुर ( जो अब पाकिस्तान में फैसलाबाद के नाम से जाना जाता हैं ) में, माता विधावती की कोख से हुआ था |

जिस दिन भगतसिंह का जन्म हुआ, उनके पिता सरदार किशनसिंह और दोनों चाचे स. अजीतसिंह व सरदार स्वर्णसिंह देश की सविधानता के संघर्ष के अपने प्रयासों के जुर्म में जेलों में कैद थे |

और उसी दिन सरदार किशनसिंह और उसके छोटे चाचा स्वर्णसिंह जेल से रिहा होकर घर आए थे | Family Shaheed Bhagat Singh

उस समय उनके बड़े चाचा अजीतसिंह मांडले जेल में थे अंग्रेज सरकार द्वारा उनकी रिहाई की सूचना भी उसी दिन घर पहुची थी

इसीलिए इतना बड़ा सुखद संयोग घटित होने पर पुरे परिवार ने बालक को भाग्यशाली कहा और उनकी दादी श्रीमती जयकौर ने उसका नाम भगतसिंह रख दिया |

हम पढ़ रहे है Family Shaheed Bhagat Singh

11 नवम्बर 1907 को अजीतसिंह और लाला लाजपत राय की जेल से रिहाई हुई थी औए दोबारा 1907 में जब भगतसिंह मात्र 2 साल के थे

तब सरदार अजीतसिंह देश को आजाद करने के मंसूबे के साथ विदेश चले गए थे और फिर भगतसिंह ने अपने चाचा अजीतसिंह को दुबारा कभी नहीं देखा, लेकिन वो उनके दिल व दिमाग में बस गये थे |

सरदार अजीतसिंह की धर्मपत्नी हरनाम कौर घर में रहकर क्रांतिकारी गतिविधियों की सहायिका बन चुकी थी

अजीतसिंह उसके बाद 15 अगस्त 1947 को ही भारत वापस लौटे थे और उसी दिन डलहौजी में उनकी मृत्यु भी हो गयी थी |

अपनी अंतिम सांस लेने के पहले उन्होंने अपनी पत्नी हरनाम कौर के चरण छुए थे |

Family Shaheed Bhagat Singh

सरदार भगतसिंह के दुसरे चाचा सरदार स्वर्ण सिंह जी का जेल में घौर यातना सहन करते हुए केवल 23 साल की उम्र जवान में ही सन 1910 में निधन हो गया था जबकि उनकी पत्नी श्रीमती हुक्म कौर जी सन 1966 तक जीवित रही थी |

भगतसिंह जब चौथी कक्षा में थे तो उनके दादा सरदार अर्जुन सिंह ने अपने दोनों बड़े पोतों जगत सिंह व भगतसिंह को अपनी दाई व बाई भुजा में, भरकर यह संकल लिया था कि मैं अपने दोनों वंशधरों को, देश की बलिवेदी पर दान करता हूँ |

चौथी कक्षा पास करने के बाद भगतसिंह के पिता सरदार किशन सिंह ने उनका दाखिला डी.ए.वी. स्कुल लाहौर में करवाया था क्योंकि भगत सिंह के माता पिता नवांकोट लाहौर में रहते थे |

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वैसे लाहौर में खालसा स्कुल भी था पर उसका प्रबन्धन उस समय सरकार परस्त लोगों के हाथ में था | इस स्कुल में इंग्लैंड के सम्राट की स्तुति करवाई जाती थी | जहाँ रोज बच्चो से ”GOD Save The King” यानि ईश्वर राजा की रक्षा करे, का गान प्रार्थना में गाया जाता था |

पर भगत सिंह के परिवार को अंग्रेजी सरकार और ब्रिटेन के राजा से घृणा थी |इसलिए उन्होंने भगतसिंह आदि का दाखिला D.A.V. स्कुल लाहौर में करवाया था |

सरदार अर्जुन सिंह संधू के तीन बेटे स्वतन्त्रता संग्राम में उतरे हुए थे जिससे उनका घर क्रांतिकारियों का अड्डा बना हुआ था |

खुद भगत सिंह के चाचा अजीतसिंह ने सन 1906 में क्रांतिकारी सूफी अम्बा प्रसाद से मिलकर देश को आज़ाद कराने का एक संगठन ‘भारत माता सोसायटी’ बनाया हुआ था जिसका नारा वन्दे मातरम् था |

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सरदार किशन सिंह, सरदार स्वर्ण सिंह, लाला हरदयाल और केदारनाथ आदि इस सोसायटी के कर्ता-धर्ता थे |

लेकिन यह भारत माता कोई हिन्दू धर्म से सम्बन्धित कोई माता नहीं थी और न ही वन्दे मातरम् उनका नारा हिंदूवादी भावनाओ से उपजा था |

शहीद भगत सिंह के खुद अपने कई खतों में वन्दे मातरम को अभिवादन के तौर पर प्रयोग किया था | उन्हें ‘भारत माता’ और वन्दे मातरम में देश की पीड़ित जनता के अलावा कुछ ओर दिखाई नहीं देता था |

भगत सिंह के पिता सरदार किशन सिंह खुद भी देश की आजादी के संघर्ष के एक सक्रिय कार्यकर्ता और नेता थे तथा कांग्रेस के साथ जुड़े हुए थे |

इस प्रकार भगत सिंह का घर क्रांतिकारी गतिविधियों और क्रांतिकारी साहित्य का एक केंद्र बना हुआ था |

शहीदे आजम ने चौथी कक्षा तक ही अपने चाचा अजीतसिंह, सूफी अम्बा प्रसाद और लाला हरदयाल की लिखी हुई अनेक पुस्तक पढ़ डाली थी |

सूफी अम्बा प्रसाद एक सच्चे देशभगत, लेखक व पत्रकार थे | उनका जन्म सन 1858 में मुरादाबाद जिले में हुआ था और जन्म से ही उनका दाहिना हाथ नहीं था |

सन 1897 में ब्रिटिश सरकार ने उनके खिलाफ राष्ट्र द्रोह का मुकदमा बनाकर उन्हें डेढ़ साल कैद की सजा दी थी |

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जेल से छुटते ही उन्होंने फिर से अंग्रेजों के खिलाफ प्रचार-प्रसार के काम शुरू क्र दिए थे | इसी कारण से अंग्रेज़ सरकार ने उन्हें एक मुकदमा बनाकर छ: साल के लिए कारागार की सज़ा दे दी और उनकी सारी सम्पत्ति जब्त कर ली थी |

1906 में वह पुन: बाहर आये| निजाम हैदराबाद के साथ उनके गहरे सम्बन्ध थे और उन्होंने सूफी जी के लिए हैदराबाद में ही एक आलिशान मकान बनाया था

लेकिन सूफी जी मकान का लालच न करके हैदराबाद छोडकर दुबारा पंजाब आ गये और सरदार अजित सिंह के साथ आज़ादी की जंग में कूद पड़े थे |

Family Shaheed Bhagat Singh

बाद में सूफी जी 1909 में अंग्रेजों के दमन से बचकर सरदार अजीतसिंह के पास इरान चले गये थे पर वहां से लौटकर दुबारा भारत नहीं आ पाए | इरान में ही उनका निधन हो गया था वही पर उनकी कब्र बनाई गयी |

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Family Shaheed Bhagat Singh

सरदार अजीतसिंह इरान से तुर्की, जर्मनी फिर फ़्रांस चले गये और पेरिस में अध्यापन का कार्य करने लगे | यही पर उन्होंने भारतीय क्रांतिकारी संघ की स्थापना की | पेरिस से वे स्विटजरलैंड चले गये और वहां लुसेन नामक स्थान पर 1912 तक रहे |

लुसेन  उन दिनों संसार भर के क्रांतिकारियों का अड्डा बन गया था जो ब्रिटिश हुकुमत के खिलाफ संघर्ष कर रहे थे |

सरदार जी ने वहां बहुत से क्रांतिकारियों से मेल कर लिया था | ज्यूरिस में वो लेनिन से भी मिले | मुसोलिनी से भी उनकी मुलाकात हुई जो उस समय तक विद्यार्थी ही थे |

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सन 1914 में विश्व युद्ध शुरू हो गया तो सरदार जी अपनी योजना में जुट गये और अंग्रेजो की तरफ से लड़ने वाले भारतियों को विद्रोह की भावना से भरते गये और भारतीय क्रांतिकारियों से सम्पर्क जोड़ते गये | कैंसर के साथ उनका सम्बन्ध हमेशा बना रहा |

अमेरिका में सरदार अजित सिंह के साथी लाला ह्रदयं ने गदर पार्टी की स्थापना करी और वहां से कई हजार सिख वापस भारत लौटकर गदर की तयारी में जुट गये |

लाला हरदयाल चाहते थे कि अजित सिंह अमेरिका से भारत जाये और गुप्त रूप से गदर पार्टी का नेतृत्व करे इसके लिए उन्होंने चंदा भी इक्कठा किया था |

यह सब चीजे गदर पार्टी के इतिहास में भी दर्ज़ है | लेकिन सरदार अजित सिंह चाहते थे कि वह जर्मनी सेनाओ द्वारा गिरफ्तार किये गये भारतीय सैनिकों को बगावत के लिए तैयार करके आज़ाद हिन्द सेना का गठन करे |

Family Shaheed Bhagat Singh

चूँकि काबुल में राजा महेंद्र प्रताप के नेतृत्व में आज़ाद हिन्द सरकार का गठन हो चूका था जिसके राष्ट्रपति राजा महेंद्र प्रताप थे |

अजित सिंह भी अपनी सेना लेकर तुर्की के रास्ते काबुल में राजा महेंद्र प्रताप ठेनुआ ( राजा मुरसान ) की सेनाओ के साथ जा मिले और अंग्रेजों के छक्के छूटा दे और भारत आज़ाद हो जायेगा |

दोस्तों मेरा मानना है कि अमर शहीद भगत सिंह का बलिदान, गाँधी जी और सावरकर आदि तमाम नेताओं से कही बढकर था |

अगर Family Shaheed Bhagat Singh कुछ समय और जिन्दा रहते तो देश को बहुत पहले ही आज़ाद करा लेते |

अगर आपको भी ऐसा ही लगता है तो हमे कमेन्ट में वोटिंग करके बताये

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दोस्तों अगर आपको यह जानकारी Family Shaheed Bhagat Singh अच्छी लगी हो तो

कृपया कमेन्ट में जय भगत जय भारत जरुर लिखे और 23 मार्च को भगत सिंह जी को पुष्पांजली जरुर समर्पित करे |

जय भगत जय भारत

आपका छोटा सा जाट लेखक भाई

चौधरी रणधीर देशवाल जिला रोहतक हरियाणा

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