रहबरे आजम का सांपला के बनिये को करारा जवाब | Ek Tha Rahbar

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जाट स्वाभिमान का सूरज रहबरे आजम छोटूराम

रहबरे आजम जाट स्वाभिमान का सूरज सर छोटूराम किसानों की आज़ादी की भावनाओं की आवाज़ थे |

सांपला के साहूकार घासी राम ने जब चौधरी छोटूराम के पिता को पंखा खींचने के लिए कहा तो बालक छोटूराम ने उसे टका-सा जवाब दिया|

 बात शुरू होती है सन 1899  में जब मिडल स्कुल की परीक्षा में

बालक छोटूराम पुरे पंजाब में दुसरे  पर आते है |

जब उन्हें यह समाचार मिला तो वो बहुत ज्यादा खुश  है | 

पर उनकी ख़ुशी ज्यादा देर नही ठहर पाती, परीक्षा में पास होने की सुचना मिलते ही वह अपने पिता के पास जाकर आगे की पढाई के लिए दिल्ली जाकर पढने की इच्छा जताते है |

रहबरे आजम का सांपला के बनिये को करारा जवाब | Ek Tha Rahbar

रहबरे आजम
कपाल मोचन यमुनानगर की सर चौधरी छोटूराम धर्मशाला के मनेजर श्री एस.के. पंघाल को जाट गजट देते जाट लेखक चौधरी रणधीर देशवाल

 

पिताजी इस सुचना से तो प्रसन्न होते है कि उनके बेटे ने परीक्षा पास कर ली किन्तु कर्जे के बोझ तले दबे होने के कारण आगे पढाने का कोई उत्साह नही दिखाया |

जब बालक छोटूराम ने जिद की तो कहा चलो सांपला चलें ,

लालाजी (बोहरे) से सलाह ले | वे राज़ी हो गये तो हिम्मत करेगे |

सांपला वाले लाला जी ने पहुचते ही बालक छोटूराम के पिता को पंखा खींचने को कहा 

इसपर स्वाभिमानी, संस्कारी छोटूराम तिलमिला उठा और लाला को फटकारते हुए कहा कि

तुम्हे लज्जा नही आती कि अपने लडके के बैठे हुए तुम पंखा उससे खींचने के लिए न कहकर 

मेरे आदरणीय बुजुर्ग पिताजी से पंखा खिचवाते हो, इससे अच्छा होता कि तुम मुझसे ही कह देते |

इसपर लाला बहुत लज्जित हुआ और उसने मजबूर होकर अपने लडके को पंखा खींचने के लिए कहा |

मोर के शिकार पर पाबंधी सर छोटूराम की देन पढने के लिए यहाँ क्लिक करे 

प्राय: महापुरुषों का जीवन मोड़ देने का श्रेय ऐसी ही घटनाओं से होता है | महात्मा बुद्ध को एक बूढ़े आदमी की दयनीय दशा ने दयालु बनाया और मृतक को देखकर वे मोक्षमार्ग के पथिक बने |

वही शहीद भगत सिंह संधू जी के अंतर्मन को दुनिया में अन्याय व मानव द्वारा मानव के शोषण को देखकर विद्रोह भावना को जागृत किया |

इसी तरह रहबरे आजम सर  छोटूराम के जीवन को इस घटना ने एक विशेष मोड़ दे दिया | यही घटना उनके भावी जीवन की धात्री बनी |

इसी से उन्हें सदियों से चले आ रहे ग्रामीण किसान के शोषण एवम उत्पीडन को समाप्त करने का अदम्य साहस प्रदान किया | उनका अगला सारा जीवन इसी पृष्ठभूमि के प्रतिक्रियास्वरूप बना |

तो दोस्तों यह थी वह घटना जिसका अक्सर सबको नही पता

जिसमे बालक छोटूराम ने एक धूर्त अहंकारी बनिये को सबक सिखाया

उसे सही पटरी पर खींचकर सीधा किया, लालाजी बालक का मुंह ताकते रह गये

शायद उन्हें अनुमान नही था कि यह बालक एक दिन पुरे पंजाब के किसानों का रहबर बनेगा |

रहबरे आजम का सांपला के बनिये को करारा जवाब – dheenbandhu sir chhoturam

रहबरे आजम

चौ. छोटूराम ने किसान और मजदूर को अपना हक दिलवाने के लिए संयुक्त पंजाब में संघर्ष का रास्ता चुना

इस संघर्ष को अपने मुकाम तक पहुंचाने के लिए हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख और ईसाई को एक मंच पर खड़ा कर दिया।

उस समय संयुक्त पंजाब में 57 प्रतिशत मुसलमान, 28 प्रतिशत हिन्दू, 13 प्रतिशत सिक्ख और 2 प्रतिशत ईसाई धर्मी थे, लेकिन वे सभी किसानों व मजदूरों के एकछत्र नेता थे।

ये बात उन्होंने सन् 1936-37 के चुनाव में सिद्ध कर दी थी, जब जम़ीदारा पार्टी के 120, कांग्रेस के 16 तथा मुस्लिम लीग (जिन्ना की पार्टी) के दो सदस्य ही चुनाव जीत पाए, जिनमें से बाद में एक जमीदारा पार्टी में मिल गया।

चौधरी साहब जम़ीदारा पार्टी (यूनियनिष्ट) के सर्वेसर्वा थे। लेकिन उन्होंने कभी भी संयुक्त पंजाब के मुख्यमंत्री (प्रीमियर) के पद का लोभ नहीं किया और हमेशा मुसलमान जाटों को इस पद पर सुशोभित किया, जो एकता के लिए आवश्यक था।

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जब सन् 1944 में मुस्लिम लीग के नेता मोहम्मद अली जिन्ना पश्चिमी पंजाब में मुसलमानों की संख्या अधिक होने के कारण वहाँ पाकिस्तान बनाने की संभावनायें तलाशने गये और उन्होंने लाहौर में भाषण दिया कि

“पंजाब के मुसलमानो, हमें अपना अलग से देश बनाना है जहाँ हम खुद मालिक होंगे। छोटूराम हिन्दू है वह हमारा कभी भी नहीं हो सकता, वह तो नाम का भी छोटा है, कद का भी छोटा है और धर्म का भी छोटा है, उसका साथ देना हमें शोभा नहीं देता।”

इस पर चौ॰ छोटूराम साहब को रोहतक से तुरत-फुरत जिन्ना साहब का जवाब देने के लिए लाहौर बुलाया और उन्होंने भाषण दिया –

“जिन्ना साहब अपने को मुसलमानों का नेता कहते हैं, मुस्लिमधर्मी होने का दावा करते हैं, लेकिन पाश्चात्य संस्कृति में रंगे हैं, अंग्रेजी शराब पीते हैं, सूअर का मांस खाते हैं, अपने को पढ़ा लिखा कहते हैं, लेकिन उनको तो इतना भी ज्ञान नहीं कि धर्म बदलने से खून नहीं बदलता। हम जाट हैं, हम हिन्दू-मुसलमान-सिक्ख-ईसाई सभी हैं।”

इस पर पंजाब की मुस्लिम जनता जिन्ना साहब के ऐसे पीछे पड़ी कि जिन्ना साहब रातों-रात लाहौर छोड़ गये और जब तक चौधरी साहब जीवित रहे (9 जनवरी 1945 तक), कभी लौटकर पंजाब व लाहौर नहीं आये।

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रहबरे आजम

इसी प्रकार सन् 1944 में काश्मीर में शेख अब्दुल्ला ने चौधरी छोटूराम के इशारे पर जिन्ना साहब को सोपुर कस्बे में जूतों की माला डलवा दी थी।

जिसके बाद जिन्ना साहब कभी भी अपने जीते जी कश्मीर नहीं आये और बम्बई में जाकर बयान दिया कि कश्मीर तो एक दिन सेब की तरह टूटकर उनकी गोद में गिर जायेगा। अब्दुल्ला खानदान हमेशा ही पाकिस्तान विरोधी रहा है।

दिनांक 15.04.1944 को चौ. छोटूराम ने महात्मा गांधी को एक लम्बा पत्र लिखा जिसका सारांश था कि “आप जिन्ना की बातों में नहीं आना, वह एक बड़ा चतुर किस्म का व्यक्ति है जिसे संयुक्त पंजाब व कश्मीरी मुसलमान उनको पूरी तरह नकार चुका है।

मि. जिन्ना को साफ तौर पर बता दिया जाये कि वे पाकिस्तान का सपना लेना छोड़ दें।” लेकिन अफसोस, कि वहीं गांधी जी कहा करते थे कि पाकिस्तान उनकी लाश पर बनेगा, चौ. साहब के पत्र का उत्तर भी नहीं दे पाये और इसी बीच चौ. साहब 63 साल की अवस्था में अचानक ईश्वर को प्यारे हो गये या धोखे से खाने में जहर देकर मार दिए।

परिणामस्वरूप गांधी जी ने जिन्ना के समक्ष घुटने टेक दिये और जिन्ना का सपना 14 अगस्त 1947 को साकार हो गया तथा साथ-साथ जाटों की किस्मत पर राहू और केतु आकर बैठ गये।

गांधी और जिन्ना जी को इतिहास ने महान बना दिया न कि उन्होंने इतिहास को महान् बनाया।

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जिन्ना को तो यह भी पता नहीं था कि 14 अगस्त 1947 को रमजान है जिसका रोजा देर रात से खुलेगा। उसने तो सायं पार्टी का हुक्म दे डाला था जब पता चला तो समय बदली किया।

इस व्यक्ति ने इस्लामिक देश पाकिस्तान की नींव रखी। आज चाहे जसवन्त सिंह या कोई और नेता जिन्ना के बारे में कुछ भी लिखे जबकि सच्चाई यह है कि जिन्ना और नेहरू में सत्ता लोलुपता के लिए भयंकर कस्मकश थी।

गांधी एक कमजोर नेता थे और इसके लिए पाकिस्तान की नींव रखी गई, ताकि दोनों के अरमान पूरे हो सकें।

चौ० छोटूराम के साथ उस समय 81 मुस्लिम विधायक तथा 37 हिन्दू-सिख विधायक थे और चौ० साहब ने 8 मई 1944 को लायलपुर की लाखों की सभा में जिन्ना को ललकार कर कह दिया था कि वह उनका एक भी विधायक तोड़ कर दिखाए।

लेकिन गांधी जी स्वयं ही टूट गए। लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि हिन्दू महासभा के अध्यक्ष दामोदर सावरकर ने इससे पहले ही सन् 1937 के अपने जोधपुर अधिवेशन में जिन्ना के दो राष्ट्रों के सिद्धान्त की अनुमति दे दी थी। (पुस्तक ‘मध्यकालीन इतिहास’ पेज नं० 103)।

रहबरे आजम

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आपका भाई चौधरी रणधीर देशवाल जिला रोहतक

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