दंगो का जिम्मेदार कौन तिरंगा या भगवा

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तिरंगा हमारा असली स्वाभिमान है भगवा नही

तिरंगा

तिरंगा भारत की आन बान और शान है । इसमें किसी को कोई शक नही होना चाहिए क्योंकि लाखों शहीदों की शहादत के बाद यह आज़ादी मिली है । अगर सच्चे अर्थों में देखे तो यह आज़ादी अनमोल है । पर आज भी कुछ धर्माधिकारी इस आज़ादी को कुचलना चाहते है ताकि उनकी सर्वोचता कायम रह सके ।

न मस्जिद को जानता हूं न शिवालयों को मानता है
जो भूखे पेट है वो सिर्फ निवालों को जानता है ।

मेरा यही अंदाज इस जमाने को खलता है
के मेरा चिराग हवा के खिलाफ क्यों जलता है ।

मैं अमनपसंद हूँ मेरे शहर में दंगा रहने दो
लाल हरे में मत बांटों मेरी छत पे तिरंगा रहने दो ।

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कोई भी इंसाफ पंसद इन्सान जो भारत को अपना देश समझता है उसे तिरंगा झंडा अपने जान से भी प्यारा लगता होगा | असल में यह केवल एक झंडा नही बल्कि हमारी विजय का प्रतीक है जिसे हमने लाखों बलिदानों के बाद पाया था | आज कुछ कट्टरपंथी लोग इस तिरंगे के नाम पर यात्रा निकाल रहे है जिन्होंने 52 साल तक तिरंगे को राष्ट्रीय ध्वज ही स्वीकार नहीं किया था |

असल में वो भगवा यानि महाराष्ट्र के पेशवा ब्राह्मणों के झंडे को राष्ट्र ध्वज बनाना चाहते है |

उनके पूर्वज गुरु गोवलकर की नजर में तिरंगा 3 रंगो से बना है

तीन का आकड़ा उनके हिसाब से अशुभ होता है |

जबकि यही लोग त्रिदेव, त्रिवेणी, त्रिलोक त्रिशूल के नाम पर

लोगों का धार्मिक शोषण करते है तब इन्हें 3 का आकड़ा अशुभ नही लगता है |

जब आज़ादी की लड़ाई के दौरान 26 जनवरी 1930 को तिरंगा झंडा फहराने का निर्णय लिया गया तो आरएसएस के संघचालक डॉ. हेडगेवार ने एक आदेश पत्र जारी कर तमाम शाखाओं पर भगवा झंडा पूजने का निर्देश दिया। आरएसएस ने अपने अंग्रेजी पत्र आर्गेनाइजर में 14 अगस्त 1947 वाले अंक में लिखा

“वे लोग जो किस्मत के दाव से सत्ता तक पहुंचे हैं

वे भले ही हमारे हाथों में तिरंगे को थमा दें,

लेकिन हिंदुओं द्वारा न इसे कभी सम्मानित किया जा सकेगा न अपनाया जा सकेगा।

तीन का आँकड़ा अपने आप में अशुभ है और एक ऐसा झण्डा जिसमें तीन रंग हों

बेहद खराब मनोवैज्ञानिक असर डालेगा और देश के लिए नुकसानदेय होगा।”

 

तो दोस्तों यह है बात बात पे तिरंगा यात्रा निकालने वाले संघ भाजपा परिवार के तिरंगा प्रेम का सच  जबकि यह भी उतना ही सच है कि धर्म बदलने से खून नही बदलता |

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