गरीब किसान बेचारा अकेला एक निष्कर्ष | दीनबन्धु सर छोटूराम

0
29
views

गरीब किसान बेचारा अकेला एक निष्कर्ष

गरीब किसान बेचारा अकेला

गरीब किसान बेचारा अकेला एक निष्कर्ष हमारा आज का विषय है जिसकी पूरी पूरी दुर्गति दीनबन्धु ने देखि पहचानी और उसको ठीक करने में अपना पूरा जीवन लगा दिया |

आज शायद गढ़ी सांपला जाऊ, दीनबन्धु सर छोटूराम स्मारक पर चल रहे निर्माण कार्य की देख रेख करने | अमूमन मैंने फ़िलहाल किसी भी कार्यक्रम मीटिंग में जाना छोड़ रखा है क्योंकि मैं अपने काम में व्यस्त हूँ पर एक यही जगह है जिसका लाड चाव नही छूटता |

जब तक रहबरे आजम की विशालकाय स्मृति का लोकार्पण नही हो जाता हमे ही देखना पड़ेगा कोई दूसरा तो खराब ही करेगा आछा तो करे कोणी | चलिए छोडिये यह बात आज मैं आपको दीनबन्धु के बारे में कुछ अलग बताना चाहता हूँ जो इस प्रकार है |

चौधरी छोटूराम ने इन्सान की तबाही की पुरी तफसील के साथ जांच की थी और उन्होंने अपना पक्का इरादा बना लिया था कि वह इन गरीब किसानों की दुखी भावनाओ को कम करने की पूरी कोशिस करेंगे |

उनको इस बात का भी दुःख था कि

जिस समाज को बनाने के काम से सरकार ने जब पीठ फेर ली

तब और कौन उसकी मदद करेगा |

यह पंजाब के लिए भी उतनी लागु होती है

जितनी भारत के दुसरे राज्य के किसान के लिए |

यह सच है कि प्रकति किसान की सबसे बड़ी दुश्मन है |

कभी-कभी तो वह बाढ़ लाती है,

तो कभी सूखा और अनेक तरह की फसल की बीमारी,

कभी टिड्डी कभी चूहे मक्खी पता नही क्या क्या आफत |

अच्छी फसल उसकी जिन्दगी में खुशिया भर देती है तो दुसरे ही क्षण वह निराशा और वेदना का भंडार बन जाता है | हानि की इस हालत में वह किस पर निर्भर हो ? उसके बुरे समय का लाभ उठाने के लिए गाँव का पैसा उधार देने वाला साहूकार मौजूद रहता है |

गरीब किसान बेचारा अकेला अपनी हालत को कैसे ठीक करे , जबकि देहात के इलाकों के बारे में सरकार भी अपने अधिकारों को छोड़ा हुआ मान ले |

एक बार एक गाँव के महाजन से

किसान ने पैसा उधार ले लिया था |

वह कर्जा दिनो दिन बढ़ता रहता है,

एक सप्ताह के बाद दुसरे सप्ताह,

फिर एक माह के बाद दुसरे महीने,

एक फसल से लेकर दूसरी फसल तक

या यूँ कहे एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक,

उस कर्ज़ की रकम बढती ही जाती है |

गरीब किसान बेचारा अकेला एक निष्कर्ष | दीनबन्धु सर छोटूराम

वह महाजन अपने आसामी से कर्ज़ अदा करने की जिद न तो नगद रूपये के रूप में करता है

और न ही एक निश्चित समय के भीतर तक के लिए करता है |

हालाकि वह अपने तरीके से अपने आसामी को

किसी भी दुसरे के मुकाबले में उसको ज्यादा से ज्यादा निचोड़ता है |


किसान के कृषि उत्पादन गुड कपास सरसों गेंहू चावल और साग सब्जी तक साहूकार की दुकान में पहुंच जाती है | पुराने रीती रिवाजों के अनुसार एक कर्जदार को चारा ईधन दूध और खुद की सेवा आदि महाजन को आमतौर पर भेंट चढानी पडती है|

कई बार तो उसके पशुओ तक का चारा किसान को डालना पड़ता है |

पर इन तमाम सौगातों की कोई रकम जमा खाते में नही चढाई जाती |

फसल बुआई से लेकर कटाई तक तो किसान की मल्कियत रहती है |

हर कष्ट से समस्या से किसान जूझता है

पर यही फसल कटते ही उसकी कोई हिस्सेदारी नही रहती |

साहूकार उसे किसान से ही लोड करवाता है

उसी की गाडी में मंगवाता है फिर उसी से उतरवाता है |

उसके बाद फसल फेरो के बाद की लाडो बनकर रह जाती है जिसके मालिक दलाल व बिचोलिये बन जाते है और बेचारा किसान दूर से ही टुकर टुकर देखता रहता है |

वाह रे ईश्वर इतना अन्याय किसान के साथ होता है पर तेरी आँख नही पसीजती सच में तू पत्थर की मूर्ति ही है | तुझमे जीवन शेष नही ना ही तू न्याय दे सकता है |

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here